एकादशी व्रत में निर्जला एकादशी का विशेष महत्व है, जिसमें व्रती व्रत के परायण होने तक जल का भी स्पर्श नहीं करते। इस बार निर्जला एकादशी व्रत 10 जून को है। व्रत का परायण 11 जून को सुबह किया जाएगा।
24 एकादशियों में सबसे अधिक शुभ व पुण्यकारी बताया गया है। मान्यता है कि इस व्रत को रखने से सभी एकादशी व्रतों के बराबर पुण्य की प्राप्ति होती है। इस व्रत में विशेष रूप से भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी का पूजन किया जाता है।
ज्योतिषाचार्य के मुताबिक एकादशी का मुहूर्त 10 जून को सूर्योदय के साथ शुरू होकर रात 1:14 बजे तक रहेगा। इसके बाद 11 जून की सुबह व्रत का परायण किया जा सकता है।
इस व्रत का पूजन करते भगवान विष्णु को पीले फूल, पंचामृत और तुलसी दल अर्पित करें। साथ ही भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी के मंत्रों का जाप करें। व्रत का संकल्प लेने के बाद अगले दिन सूर्योदय होने तक जल की एक बूंद भी ग्रहण ना करें। इसमें अन्न् और फलाहार का भी त्याग करना होगा।
अगले दिन यानी द्वादशी तिथि को स्नान करके फिर से श्रीहरी की पूजा करने के बाद अन्न्-जल ग्रहण करें और व्रत का पारण करें। बताया जाता है कि इस व्रत को पांडव पुत्र भीम ने किया था, इसलिए इस व्रत का भीमसेन एकादशी के नाम से भी जाना जाता है।
मनोवांछित फल की प्राप्ति :
ज्योतिषाचार्य ने बताया कि निर्जला एकादशी के दिन जरूरतमंद लोगों को दान करने से मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है और पापों का नाश होता है। इस दिन एक चकोर भोज पत्र पर के सिर में गुलाब जल मिलाकर ओम नमो नारायणाय मंत्र तीन बार लिखें। आसन पर बैठकर विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करें। पाठ के बाद यह भोज पत्र अपने पर्स या पाकेट में रखें। धनधान्य की वृद्धि के साथ-साथ रुका हुआ धन भी मिलेगा।





