तान्हा पोला के दौरान मारबत का जुलूस निकालने की प्रथा शहर में कई वर्षो से चली आ रही है। कहा जाता है कि मारबत और बडग्या को बुराई के प्रतीक के रूप में माना जाता है। इस परंपरा को चलाने के लिए मारबत का निर्माण करनेवाले कारागीरों की पीढ़ियां अब भी काम कर रही है। यह परंपरा काली और पीली मारबत बनाकर आज भी चलाई जा रही है। इस परंपरा को अब भी अविरत चला रहे हैं।
जागनाथ बुधवारी के तर्हाने तेली समाज मंडल की पीली मारबत का निर्माण 60 वर्षीय कारागीर गजानन शेंडे कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि वे पिता भीमाजी शेंडे की मृत्यु के बाद से वे हर वर्ष मारबत का निर्माण कर रहे हैं। मारबत १८८५ से बनाई जा रही है। इसके निर्माण की शुरुआत भीमाजी शेंडे के पिता मूर्तिकार गणपतराव शेंडे ने की थी। उनकी मृत्यु के बाद मारबत निर्माण का बीड़ा उनके पुत्र भीमाजी शेंडे ने उठाया और भीमाजी की मृत्यु के पश्चात अब इसकी जिम्मेदारी उनके पुत्र गजानन शेंडे निभा रहे हैं। मूर्तिकार के रूप में मारबत निर्माण में सदाशिव वस्ताद तडीकर की भी पीढ़ियां कई दशकों से कार्यरत हैं। उनके बाद अब उनके नवासे जयवंत मणिराम तकितकर मंडल में व्यवस्थापक के रूप में कार्यभार संभाल रहे हैं।
उसी प्रकार पीली मारबत के बाद शहर में काली मारबत का भी समावेश इस परंपरा में बरसों से किया गया है। दोनों मारबतों का निर्माण बुराई का प्रतीक के रूप में किया गया था। जयवंत तकितकर ने बताया कि पीली मारबत के निर्माण की शुरुआत १८८५ से की गई थी। इसे बनाने का उद्देश्य उस शहर में फैल रही बीमारियों से मुक्ति पाना था। तकितकर ने बताया कि उस समय शहर में बीमारियों का दौर सा चल पड़ा था। तब लोगों में एक धारणा बन गई थी कि मारबत का निर्माण करने से बीमारियों से मुक्ति मिलती है और इसी के तहत लोगों ने इसका निर्माण शुरू किया।
उसी प्रकार काली मारबत का भी इतिहास बहुत पुराना है। इसका निर्माण पिछले १३१ वर्षो से किया जा रहा है। बताया जाता है कि १८८१ में नागपुर के भोसले राजघराने की बकाबाई नामक महिला ने विद्रोह कर अंग्रेजों से जा मिली थी, इसके बाद भोसले घराने पर बुरे दिन आ गए थे, इसी बात के विरोध में काली मारबत का जुलूस निकालने की परंपरा चली आ रही है। काली मारबत को महाभारत काल में रावण की बहन पुतना राक्षसी का रूप दिया गया है। श्रीकृष्ण के हाथों मारे जाने के बाद गोकुलवासियों ने काली मारबत को गांव के बाहर ले जाकर जला दिया था। जिससे गांव की सभी बुराइयां व कुप्रथाएं बाहर चली जाएं, तभी से काली मारबत का निर्माण किया जा रहा है।
ऐसी धारणा है कि मारबत को शहर से बाहर ले जाकर जलाने से सारी बुराइयां, बीमारियां, कुरीतियां भी खत्म हो जाती है। उसी प्रकार जुनी मंगलवारी में श्री साईंबाबा सेवा मंडल सार्वजनिक पीली मारबत उत्सव समिति की ओर से प्रतिवर्ष जवान पीली मारबत का निर्माण किया जाता है। कहा जाता है कि यह मारबत जागनाथ बुधवारी से निकलनेवाली पीली मारबत की बेटी है। इसलिए इसे ‘तरुण पीली’ मारबत कहा जाता है। इस मारबत का निर्माण ११८ वर्षो से किया जा रहा है। इसके निर्माण की शुरुआत स्व. काशीराम मोहनकर नामक व्यक्ति ने की थी। उन्होंने उम्र के 80 वर्ष तक यह मारबत बनाई। उनकी मृत्यु के बाद अब उनके पुत्र मनोहर मोहनकर इस मारबत का निर्माण कर रहे हैं





